जो कक्षा और किताबों से परे समाजशास्त्र की सेवा करते रहे…

जो कक्षा और किताबों से परे समाजशास्त्र की सेवा करते रहे…

जेएनयू के समाजशास्त्र विभाग की स्थापना करने वाले प्रोफेसर योगेंद्र सिंह का बीते दिनों निधन हो गया. उन्हें याद कर रहे हैं समाजशास्त्र विभाग के वर्तमान विभागाध्यक्ष प्रोफेसर विवेक कुमार.

प्रोफेसर योगेंद्र सिंह. (फोटो: आशीष)

अकादमिक संसार के ज़्यादातर लोग जानते है की प्रो. योगेंद्र सिंह (1932-2020) जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के ‘सामाजिक पद्धति अध्ययन केंद्र’ यानी समाजशास्त्र विभाग के संस्थापकों में से एक थे, पर उनके समाजशास्त्र के सर्जन की यात्रा कम लोग जानते.

ये लेख उनसे उनके समाजशास्त्र की यात्रा पर हुई अनेक अनौपचारिक वार्ताओं पर आधारित है. उनके वो अवधी के बोल मेरी स्मृति में ऐसे रच बस गए हैं कि जैसे मेरे जीवन का एक हिस्सा ही हों…

प्रो. योगेंद्र सिंह अपने चिरपरिचित सहज अंदाज मे हंसते हुए बताते थे, ‘मेरा समाजशास्त्र पीली सरसों के खेतों और गांव की मिट्टी मे सावन की पहली फुहार से उठती हुई सोंधी-सोंधी महक में पैदा हुआ. छोटे-छोटे कुटीर उद्योग के खत्म होते हृदय विदारक दृश्यों और गांव में जमींदारों के मनमाने कामों के कारण उपजी गरीबी की वास्तविकता ने मेरे अंदर समाज को और पास से समझने की ललक पैदा की. ज़मींदार के घर में शादी हो, तो सारे गांव पर कर लगा दिया जाता था-बिहऊ, जमींदार ने अगर हाथी खरीदा. तो हथियाना नाम का कर लगा दिया जाता था. इन सामाजिक तथ्यों को समझना मेरे लिए चुनौती थी क्योंकि मैं इसी सामाजिक संरचना का हिस्सा था.’

बाद में गांव से पलायन करके शहरों मे बसे रिक्शे वालों के भूख मिटाने के तरीकों ने मेरी समाजशास्त्र की समझ को और मजबूत किया. मैने पाया कि यद्यपि शहर आकर उनकी आय तो बढ़ गयी पर उनकी आयु घट जाती थी.

वहां से जब मैं लखनऊ विश्वविद्यालय, जिसे उस समय कैनिंग कॉलेज के नाम से भी जाना जाता था, पहुंचा तो ‘सामाजिक मूल्यों’ पर आधारित एक नवीन समाजशास्त्र से मेरा परिचय हुआ. राधाकमल मुखर्जी, डीपी. मुखर्जी एवं एके सरन जैसे समाजवैज्ञानिकों का सानिध्य प्राप्त हुआ.

अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र का मिला-जुला ज्ञान लेकर मैं आगरा के इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस में समाजशास्त्र पढ़ने लगा (1958). उसके बाद जयपुर में 1961 में समाजशास्त्र विभाग स्थापित किया और जोधपुर में भी अध्यापन किया.

प्रो. योगेंद्र सिंह कहते थे कि किसी भी विषय को सीखने का सबसे बेहतर तरीका है की आप उसे खुद पढ़ाने लग जाओ.

देश आज़ादी के आदर्शवाद से जाग रहा था और अपनी कठिनाइयों के लिए किसी और को उत्तरदायी नही ठहरा सकता था. भारत परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्वात्मक के मोड़ पर  खड़ा था. इस सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति ने भी मेरी समाजशास्त्रीय चेतना को नई दिशा प्रदान की.

इसलिए मैंने प्रक्रियाओं, संरचनाओं और परंपराओं को समझने के लिए ऐतिहासिकता का साथ कभी नही छोड़ा. मेथडोलॉजिकल इंडिविजुअलिस्म इसीलिए मैंने कभी स्वीकार नही किया.

लखनऊ, आगरा, जयपुर, और जोधपुर से होता हुआ जब मैं 1971 में नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पहुंचा तो समाजशास्त्र को एक नई दिशा देने का मौका मिला. यहां भारतीय संविधान में प्रदत्त मूल्यों यथा-समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और सामाजिक न्याय को समायोजित करते हुए समाजशास्त्र का पाठ्यक्रम बनाना था.

आधुनिकीकरण की चुनौतियों से कैसे निपटा जाएगा और योजनाबद्ध विकास की चुनौतियों से कैसे सामना किया जाए, इसके लिए हम लोगों को अपने समाजशास्त्र विभाग को और भी मजबूत बनाना था. इसके साथ ही एक ऐसा प्रतिनिधित्वकारी विभाग भी बनाना था, जिसमें भारत की सभी सामाजिक और सांस्कृतिक भिन्नताओं का समावेश हो सके.

एक छोटा भारत दिखाई पड़े- लिंग, प्रांत, धर्म, जाति आदि सभी का प्राधिनिधित्व इसमें दिखाई पड़े. तीसरी ओर वैश्विक समाजशास्त्र से जेएनयू के समाजशास्त्र विभाग को जोड़ने की चुनौती भी थी.

ऐसे में न केवल हम लोगों ने एक प्रतिनिधित्वकारी विभाग ही बनाया बल्कि उसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय चुनौती से भी जोड़ा. हम लोगों ने विषय में थ्योरी और इम्पिरिकल रिसर्च दोनों को महत्व दिया और अमेरिकन मॉडल में टालकॉट पार्संस के मॉडल को वरीयता दी.

थोड़े समय ही बाद देश के समक्ष आंदोलनो की चुनौतियां भी खड़ी हो गईं. देश के कई प्रांतों में विभिन्न प्रकार के आंदोलनो ने अपनी मांगो को लेकर एक क्राइसिस पैदा कर दी, तो हमने आंदोलनो के समाजशास्त्र पर भी जोर दिया.

प्रो. टीके उमन भारत में संभवतया पहले सामाजशास्त्री है जिन्होंने समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से इस पर एक शोध-ग्रंथ प्रकाशित किया. मैंने जाति को समझने के लिए उसे संरचना और सांस्कृतिक अवधारणाओं में विभक्त किया पर मेरा हमेशा यह मानना रहा है कि जाति भारतीय समाज की विशिष्‍ट संस्था है. और अगर समाजशास्त्री यह मान लेंगे तो इसको और अच्छी तरह समझ सकेंगे.

आधुनिकीकरण की चुनौतियों से निकल कर हम जब भूमंडलीकरण के दौर में आए तो हम लोगों ने अपने विभाग को विश्व के अनेक विभागों से जोड़कर ग्लोबल-स्टडीज़ प्रोग्राम की स्थापना की, जिससे इस युग में ज्ञान का आदान-प्रादान सुचारू रूप से हो सके.

प्रो. योगेंद्र सिंह ने अत्यंत गंभीरता से एक बार बताया कि समाजशास्त्र को अगर और व्यापक स्तर पर स्थापित करना है तो केवल पठन-पाठन और शोध से ही यह काम नही होगा. समाजशास्त्र की जड़ें गहरी करने के लिए हमें इस डिसिप्लिन की सहयोगी संस्थाओं को भी विकसित और सुदृढ़ करना चाहिए.

शायद इसीलिए अपनी व्यस्तताओं के बाद भी उन्होंने इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसाइटी के अध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभाला. दूसरी ओर उसके जर्नल सोशियोलॉजिकल बुलेटिन में लगातार लेख भी लिखते रहे.

उनके नेतृत्व में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग की छवि इतनी उन्नत थी कि अगस्त 1986 में ग्यहरवीं विश्व समाजशास्त्र कांग्रेस की मेजबानी का जिम्मा इस विभाग को दिया गया. इस प्रकार वे कक्षा और किताबों से परे समाजशास्त्र की सेवा करते रहे.

तो कुछ इस तरह प्रो. योगेंद्र सिंह  के समाजशास्त्र की निर्मिति हुई. हमेशा समय और समाज की आवश्यकताओं से जुड़कर उन्होंने अपने समाजशास्त्र को जिया.

प्रो. योगेंद्र सिंह केवल एक अध्यापक ही नहीं बल्कि एक संस्था के निर्माता के रूप मे भी समाजशास्त्र के लिए जिए. यही वजह रही कि प्रो. योगेंद्र सिंह, जिन्होंने 1971 से 1997 तक जेएनयू में ही रहकर अपना अध्यापन, शोध और प्रशासनिक कार्य करते रहे पर इसके बावजूद भारत के अधिकांश विश्वविद्यालय के अध्यापक और छात्र उन्हे अपना शिक्षक मानते हैं.

सत्य यही है कि प्रो. योगेंद्र सिंह जैसे व्यक्तित्व वाले शिक्षाविद् कभी एक संस्थान, संस्था या एक समुदाय की नहीं बल्कि पूरे समाज की पूंजी होते हैं. मेरी विनम्र श्रद्धांजलि.

(लेखक जेएनयू के समाजशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष हैं.)

Categories: कैंपस, विशेष, समाज

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Mahmeed

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